ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः

‘‘अब बोलो क्या कहना चाहते थे।“

‘‘कहना कुछ नही था, याद दिलाना चाहता था एक पुराना सूत्र, ‘ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः’। ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं। कहा तो गया है भव बन्धनों आदि के बारे में, लेकिन यदि तुम अपनी जटिल समस्याओं को भी भवबन्धन ही मान लो तो यह सूत्र इन पर भी लागू होता है। जिस भी समस्या या प्रवृत्ति या व्याधि से मुक्ति चाहते हो, तो यह पता लगाओ कि इनकी जड़ें कहाँ तक पहुँची हैं। इनको शक्ति कहाँ से मिलती है, उनकी गहराई तक तुम लौट नहीं सकते, परन्तु उनको उजागर करके उनको अशक्त बना सकते हो। उजाड़ना का अर्थ जानते हो?

‘‘जानता तो हूँ, पर जब तुम पूछ रहे हो तो जरूर कोई पेंच होगा। तुम्हीं बताओ।“

‘‘निर्मूल करना। जड़ों को उखाड़ देना। प्रयोग तो इसका बस्ती या घर उजाड़ने आदि के अर्थ में होता है, परन्तु वहाँ भी नींव से उखाड़ फेंकने का भाव है। यह उखाड़ना या उजाड़ना तभी संभव है जब पता हो कि इसकी जड़ें कहाँ तक पहुँची हैं अन्यथा ऊपर से काट कर गिरा दो तो भी बरगद या पीपल की जड़ों की तरह इन समस्याओं की जड़ें बची रह गईं तो उन्हीं से कई जगह से वे कई दरारों से फूट पड़ेंगी।“ 

‘‘सो तो है।“

‘‘और एक और सूत्र है, 'आत्मानं विद्धि', तो  अपने को जानने का अर्थ भी अपने को जड़-मूल और शाखा पत्ती सबके साथ जानना है। जड़-मूल की तलाशा इतिहास की जड़ों तक जाती है और शाखा-पत्ती की समाज और पूरे विश्व तक - इसका जितना भी जानने वश का है। बौद्धिक जब सामाजिक हस्तक्षेप करता है तो इन्ही की व्याख्या करके जागरूकता पैदा करने के माध्यम से करता है। 

"अब यह हमारा जातिवाद ही है। हमारी आधी ताकत इससे ही लड़ने में चुक जाती है। यह जातिवाद भारतीय समाज को समाज तक बनने में बाधक रहा है। इससे लड़ाई कितनी पुरानी है जानते हो, इसकी जड़ों को समझने की कभी कोशिश की गई?” 

‘‘मेरी जानकारी में की तो गई है। घुरये ने की है, श्रीनिवास ने की है। मेरी जानकारी अधिक नहीं है, पर, हाँ, कुँवर सुरेश सिंह ने की है। उन्होंने ही तो पहली बार सुझाया कि हम कुछ जातियों या धर्मों या भाषाओं में बँटे लोग नहीं है, पाँच हजार से अधिक समुदायों में बँटे लोग हैं। बँटे भी, एक दूसरे से तने भी, एक दूसरे से परहेज करने वाले, चिढ़ने और झगड़ने और खींचतान करने वाले लोग भी और इसके बाद भी किसी रहस्यमय सूत्र से एक दूसरे से इस तरह जुड़े हुए भी कि कहीं कोई खँरोच बाहर से आए तो सारे विभेद भूल कर एक सत्ता के रूप में खड़े हो जाते हैं। खैर यह बात तो बहुत पहले अंग्रेजों ने भी, मिसाल के लिए रिजले ने भी कही थी। इसी रहस्यमय एका को, इसकी दरारों को पहचान कर, विभेद को टकराव की ऐसी स्थिति में लाने की वे इतनी चालाकी से कोशिश करते रहे कि दिल तो फिरें, दिमाग ख़राब तो हो, पर किसी को शक तक न हो कि जहर बोया जा रहा है। उल्टे जहर पीने वालों को इसकी ऐसी लत लग जाय कि वे इसकी खूराक बढ़ाते चले जाएँ।“

‘‘यार, यही तो बात है। तुमने तो मेरी समस्या ही आसान कर दी। परन्तु घुरये हों या श्रीनिवास या सुरेश कुमार, इन्होंने जो है उसे देखा, यह पैदा कैसे हुआ? इसे ताकत कहाँ से मिलती है? इसकी ओर उनका ध्यान नहीं गया। जा नहीं सकता था, क्योंकि वे उस पाले में, खेल के उन नियमों को मानते हुए, जिसे हमें गुलाम बना कर रखने वालों ने तैयार किया था, अपने दाव पेच दिखाते रहे। यह ध्यान न रहा कि यह पाला ही फरेब है। घुरये या श्रीनिवास से तो कभी मिलने की सोच ही नहीं सकता था। कुँवर साहब से भी उदयप्रकाश के कारण मुलाकात हो सकी। वह रिश्ते में उदयप्रकाश के फूफा लगते थे। उदयप्रकाश साथ न होते और समय माँग कर मिलने गया होता तो वह पहले ही दुस्साहस पर मुझे घर से निकाल देते। खैर जब मैंने कहा कि यह आर्य-द्रविड़ वाला विभाजन ही गलत है और आर्य नाम की न कोई जाति थी, न वे कहीं बाहर से आए थे, तो उनका गुस्सा देखने लायक था। उनके गुस्से पर मैं मुसकराता रहा तो उनको लगा मेरे पास भी कुछ कहने लायक है। और इसके बाद आधे घंटे तक मैं अपनी बात समझाता रहा और वह चुप सुनते रहे। एक बार भी मुँह तक न बनाया और अन्त में उनसे कुछ कहते न बने। यह सीधे नहीं माना कि वह गलत थे या मैं सही। ज़िंदगी भर काम करने, अपने विश्वकोशीय काम के कारण विश्वविख्यात व्यक्ति को अपने अंतिम दिनों में लगे कि उसके पाँव के नीचे से ज़मीन ही खिसक गयी है, वह अवाक् ! कारण, एक छोटा सा फर्क। वह उस मजबूत दीवार को न तो तोड़ सके न उसके पीछे देख सके जो मैं भाषा और अपने ढंग की सामाजिक समझ के कारण देख रहा था, और उसी का आभास उन्हें हुआ। उदयप्रकाश को तो पता ही न चला कि इस बीच हुआ क्या है। वह अलग अपनी बुआ जी से बातें करने में मगन थे.“

‘‘तब तो तुम इन सबसे बड़े विद्वान हुए यार! कल मैं एक सर्टिफिकेट बनवा कर लाऊँगा और तुम्हें अर्पित करूँगा जिस पर लिखा होगा, दुनिया का सबसे बड़ा सब-कुछ जानने वाला इंसान! चलेगा?” हँसने का ऐसा मौका वह क्यों छोड़ता।

‘‘यदि छेड़खानी करते रहे तो विषय पर आज भी नहीं पहुँच पाएँगे, दोष मत देना।“ मैंने हँसते हुए ही याद दिलाया तो वह सँभल गया। मैंने कहा, ‘‘देखो बड़ा या छोटा का नहीं होता। दिशा का होता है। तुम प्रकांड विद्वान हो, तुम्हारे हाथ में दूरबीन भी हो, घूर&घूर कर किसी एक ही दिशा में देख रहे हो और जिस चीज की तलाश हो वह ठीक तुम्हारे पीछे पड़ी हो जिस पर एक अनपढ़ की भी नजर पड़ जाए और वह कहे, जनाब जिसे तलाश रहे हो वह उधर है ही नहीं, वह तो यह रही। आपके सटे पीछे। मैं उस अनपढ़ जैसा हूँ जिसके हाथ में न दूरबीन है, न चश्मा, न वह किसी की बताई हुई दिशा में ही घूरता हुआ जो हाथ लग जाए उसे तलाश रहा हो, पर जिसकी आँखें खुली हों और चारों ओर नजर डालने की आदत से लाचार हो। खैर, अब बीच में टोकना मत नहीं तो हरिकथा अनन्त हो जाएगी।

“हमारी वर्णव्यवस्था का संबन्ध कृषि के आरंभ से है। इसका अपना आर्थिक आधार है जिसके स्तरीभूत होने के कई कारण और कई चरण हैं। इसे ब्राह्मण ने नहीं बनाया या चाहो तो एक तरह से कह सकते हो ब्राह्मणों ने ही बनाया पर ढोग और पाखंड के चलते नहीं। किसी को धोखा देने के लिए नहीं, न अपने को सबसे ऊपर रखने के लिए। इसकी अनिवार्यता थी। ऐतिहासिक जरूरत। कृषि युग की अपरिहार्यता! 

इसका इतिहास आठ दस हजार साल पुराना है।

“यह बताओ, तुमने प्रेमचन्द की कहानी पूस की रात पढ़ी है?”

“पढ़ी तो है पर उसकी जरूरत यहाँ क्या आन पड़ी?”

“किसानी की मुसीबत समझाने के लिए। खेत की रखवाली के लिए बेचारे ने झोंपड़ा डाला। कड़ाके की ठंड । उसे लगता है कि नीलगायों का झुंड खेत में घुस आया है। उठ कर भगाने की सोचता है पर ठरन ऐसी कि बार बार कोशिश करने के बाद पड़ा ही रह जाता है। खेत जाय भाड़ में। कुछ ऐसी ही है कहानी न?”

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

“देखो यह मुसीबत तो आज की है जब जंगल कट चुके है। वनवासी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं है? जंगली जानवरों की रक्षा के लिए अभयारण्य बनाए जा रहे हैं। अब उस आरम्भिक चरण की समस्या पर ध्यान दो जब एक छोटे से भूखंड को झाड़ झंखाड़ जला कर साफ किया गया है।  उसमें फसल उगाई गई है। उसको घेरे चारों ओर जंगल ही जंगल, उनमें विचरते कबीले, जिनकी नजर भी इस फसल पर। लेकिन सबसे बड़ा खतरा अरना भैंसे, हिरन, नीलगाय, घड़रोज, गैंड़े । उनके प्रकोप से खेती को बचाना कितनी बड़ी समस्या थी। इनसे निबटना कितने साहस और पराक्रम का काम था। फिर हिंस्र जानवर थे । भेड़िये, लकड़बग्घे, तेंदुए, बाघ और शेर जिनसे अपने लोगों की और पालतू पशुओं की रक्षा का भी प्रश्न। यह केवल रात की समस्या नहीं थी। यदि सुरक्षा के लिए एक प्रभावशाली बल नहीं तैयार होता, खेती-बारी का काम धरा रह जाता। यह एक जटिल कार्यभार था और इसलिए कृषिकर्मी और रक्षाकर्मी में उसी समाज का आन्तरिक विभाजन जो अपने को देव या ब्राह्मण या सुर कहता था, अपरिहार्य था। देव, ब्राह्मण, सुर सभी आरम्भ में पर्याय थे जिसका मोटा अर्थ था खेती करने वाला। इसका सबसे भरोसे का हथियार था अग्नि। अग्नि का उपयोग जमीन की सफाई के लिए, सूखे अनाज को भूनने के लिए, सर्दी से बचाने के लिए और जानवरों से ही नहीं, जंगली लुंचनकारियों से भी अपनी खेती को बचाने के लिए।  अग्नि ही विष्णु है, वही रूद्र है, वही पूषन है, वही माता, पिता, भाई, बंधु, सखा, सहायक सब कुछ है।

“तो पहला विभाजन हुआ रक्षाबल, कृषीबल या किसान और इनके कार्यविरत बूढ़े बुजुर्ग पितर जिनको बच्चों को सँभालने, सिखाने, और अपने अनुभव के अनुसार सलाह देने आदि का काम करते हुए अपना समय बिताना था -  (तिस्रः प्रजा आर्या ज्योतिरग्रा:)। इन बुजुर्गो का ही सम्मान और नाम – बाबा, आर्य, आर्या संज्ञा भी इन्हीं की थी जो बाद में भी ब्राह्मणों के लिए जारी रही। इस विभाजन के बिना कृषियज्ञ संस्थित नहीं हो सकता था। आरंभ में इनका प्रयास था अधिक से अधिक लोगों को खेती के लिए प्रोत्साहित करके अपनी संख्या, सुरक्षा बढ़ाना। स्वयं भी अधिक से अधिक संतानें पैदा करता। खेती के संस्थित हो जाने के बाद अन्न के प्रलोभन से कृषि कि दिशा में स्वयं पहल न करने वाले धीरे धीरे अपनी सेवाएँ इन्हें देने को तैयार हुए और श्रमभार क्रमश: उन पर लदता गया और पहले के कृषिकर्मी दूसरे साधनों से भी अपनी आय बढ़ाने लगे। ये ही वैश्य बने जिनके ही पास कृषि, पशुधन, और वाणिज्य - कृषिवाणिज्यगोरक्षा - बना रहा। गीता में गुणकर्म आधारित जिस वर्णव्यवस्था की पुरानी याद बनी रह गई है, वह इसी अवस्था की याद है। और दूसरी ओर उसी ब्रह्म या परम पुरुष ने अपने को खंडित कर चारों वर्णों में परिणत कर दिया, यह भी उसी की प्रतीकात्मक स्मृति थी जिससे जन्मजात वर्णों की मान्यता को बल मिला। भैये, जब तक कृषि प्रधानता बनी रहेगी, वर्ण-व्यवस्था मजबूत रहेगी! “

“यह कहाँ पढ़ा है, तुमने।“

“यह कई तरह के तिनकों को मिला कर मेरे द्वारा तैयार किया गया खाका है जो गलत भी सिद्ध किया जा सकता है। यह काम तुम्हें करना है। कर सको तो, क्योंकि किताबों का ज्ञान तो तुम्हें ही अधिक है।“

12/15/2015 4:27:44 PM

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