अधूरे के अधूरे का अधूरा


जब मैं कहता हूं कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेता अपने और अपनों के लिए रियायतें माँग रहे थे तो यह एक सामान्य कथन है। यह कुछ लोगों को खटका भी होगा और एक मित्र ने लाल, बाल और पाल का नाम लेते हुए मुझे अपनी स्थिति स्पष्ट करने को भी कहा। मेरा इरादा इन महापुरुषों और इन जैसे महापुरुषों के त्याग और बलिदान और साहस को कम करके आँकना नहीं है। यदि हम कांग्रेस के भीतर के प्रथम विभाजन, जिसे नरम दल और गरम दल का नाम दिया गया, पर ध्यान दें तो मुझे नरम दल के नेता अधिक दूरदर्शी दिखाई देते हैं और यह दूरदर्शिता कांग्रेस का विरोध करने वाले सैयद अहमद में भी इस रूप में देखी जा सकती है कि इन्होंने सत्तावन के संग्राम से जो दुर्भाग्यवश विद्रोह बन कर रह गया, शिक्षा ली थी और जानते थे कि इस बीच सीधे इंगलैंड के तख्त के अधीन प्रशासन के आ जाने के कारण ब्रितानी चौकसी और ताकत बढ़ी है, जब कि भारत की सशस्त्र संग्राम छेड़ने की क्षमता को लगभग कुचल दिया गया है। मेरा अध्ययन इस विषय में मेरे अनेक मित्रों से भी कम है और अनुभव का तो सवाल ही नहीं उठता...’’

’’जब न ज्ञान है न अनुभव तो चुप तो रह सकते हो, बीच में टाँग क्यों अड़ाते हो।‘’

’’इसलिए कि अनुभव किसी के पास नहीं है, और किताबों से अलग अलग सूचनाएं मिलती हैं, पर वह दृष्टि नहीं जो तथा‍कथित नरम दलीय नेताओं के पास थी। यह नरम दल का ही बोध था जो गॉधी को हस्तान्तरित हुआ या उलट कर कहें कि यह नरम दल का नेतृत्व ही था जिसने गॉंधी की संघर्ष क्षमता को पहचाना और कांग्रेस का नेतृत्व उन्हें सौंपने का फैसला किया। गरम दल के ये तीनों नेता बहुत पढ़े-लिखे थे, साहसी थे, असाधारण वक्ता थे, परन्तु आवेश के कारण उनकी दृष्टि उतनी स्वच्छ नहीं थी जितनी गाँधी की। सुभाषचन्द्र बोस भी गरम दलीय सोच के ही थे और गॉंधी उनके मिजाज को समझ लेने के बाद उनसे भी कांग्रेस के नेतृत्व को मुक्त रखना चाहते थे। जोशीले लोग आकर्षक लगते हैं, परन्तु वस्तु्स्थिति का आकलन करने में चूक कर जाते हैं और इसलिए उनके कामों के परिणाम उतने श्रेयस्कर नहीं होते जितने उनके उत्सर्ग भाव से आशा बँधती है।

'' हमारी शक्ति उस खास चरण पर और उससे आगे भी सत्तावन की तुलना में बहुत कम हो गई थी। उससे पहले तलवार बन्दूक, बर्छा फरसा जैसे हथियार जनता के पास थे। अब एक साख लम्बाई से बड़े चाकू छुरे तक हथियार मान कर प्रतिबन्धित थे। बन्दूक सरकारी जाँच के बाद सरकार के स्वामिभक्तों को दिए जाते थे जो ब्रिटिश सत्ता के पायों-थूनियों का काम करते थे। 1818 के बाद धार्मिक संवेदना की उपेक्षा करते हुए जिस तरह की मनमानी की जाने लगी थी उससे सीख लेते हुए शासन ने संवेदनशीलता दिखाना आरंभ कर दिया था। अत: धार्मिक प्रश्नों पर उस तरह का सामाजिक विक्षोभ जो ज्वालामुखी की तरह फट पड़े, नहीं पैदा किया जा सकता था। उल्टे इसकी आँच हिन्दुओं-मुसलमानों की ओर मोड़ कर और पारस्परिक अविश्वा‍स को बढ़ाने के लिए अपनाये गये तरीकों से उस निकटता को तोड़ा जा चुका था, जो सत्तावन में पैदा हो सकी थी। अत: छिट फुट बम दागने से क्षणिक उत्तेजना तो पैदा की जा सकती थी, बदले की कार्रवाई भी की जा सकती थी, परन्तु सत्ता नहीं खत्म की जा सकती थी। यह ऐतिहासिक विवशता थी जिसका ध्यान रखते हुए ही कोई प्रभावकारी तरीका अपनाया जा सकता था।

''इस मोड़ पर केवल दो चीजें नई थीं और जिनका उपयोग किया जा सकता था। पहला था प्रेस और दूसरा था यह आश्वासन कि भारत का प्रशासन न्याायपूर्वक और भारतीयों के हितों की चिन्ता करते हुए किया जाएगा। गरम दल के नेता पहले का आलोचनात्मक तेवर के साथ पाठ कर रहे थे और नरम दल के नेता उस हितकारी शासन के आश्वासन की व्याख्या करते हुए अपनी मांगें रख रहे थे । परन्तु प्रेस पर सरकारी नियन्त्रण था और सत्ता‍ को चुनौती देने वाली या आलोचना करने वाली सामग्री को जब्त कर लिया जाता था, संपादकों, लेखकों को दंडित किया जाता था, और एक अल्पशिक्षित समाज में केवल शिक्षितों तक अपने विचार पहुँचाये तो जा सकते थे परन्तु उन्हें किसी कारगर कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता था।

"ऐसा मुझे लगता है, हो सकता है कुछ अन्य तथ्यों की ओर ध्याान जाने पर इसमें सुधार की अपेक्षा हो। विपिन चन्द्र पाल और अरबिन्दो उस बंगभंग के विरुद्ध विप्लवी गतिविधियों में शामिल हुए थे और यह मान कर शामिल हुए थे कि यह हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच दरार डालने के लिए किया गया प्रयास है, परन्तु् इस प्रयास को उन्होंने अपने आन्दोलन से सफल हो जाने दिया। यदि सभी मुसलमान, यहॉं तक कि कांग्रेस में शामिल मुसलमान भी इसका समर्थन कर रहे थे तो विभाजन पर चुप रहना अधिक समझदारी रही होती, क्यों कि विरोध से ब्रिटिश कूटनीति सफल हुई। बंगाल नहीं बँटा पर दिल बॅट गए। बंगाल को प्रशासनिक द़ष्टि से अपनी विशालता के कारण बँटना ही था। मैं नही जानता नजरुल इस्लाम की कविता में फारसी शब्दों की वृद्धि का भी यह एक कारण था या नहीं, परन्तु जिसे सुनीति बाबू ने मुसलमानी बांग्ला का नाम दिया उसकी पैदाइश इससे जुड़ी हो सकती है। मैंने इसका विस्तार से अध्यंयन नहीं किया। मुस्लिम लीग की स्थापना का तो इससे सीधा संबन्ध है ही। हम प्रत्येक मामले के विस्ताार में जाऍंगे तो दिशा बदल जाएगी। एक बात का श्रेय अवश्य इन महापुरुषों को जाता है कि इन्हों ने अंग्रेजी में लिखने के साथ हिन्दी, मराठी और बांग्ला में भी लेखन किया और इस दृष्टि से हमारी समस्या के सन्दर्भ में इनका महत्व अवश्य है।

कांग्रेस के अन्य‍ नेताओं में आवेश था विजन या क्रान्‍‍तदर्शिता नहीं थी जो गांधी के पास थी। गांधी जी के साहित्य का भी मुझे आधिकारिक ज्ञान नहीं है, परन्तु जितना उलट पलट कर देख सका हूँ कहीं यह संकेत नहीं मिलता कि अपने सत्याग्रह को उस ब्राह्मणी शस्त्राागार से लिया था जिसमें प्राण देने की ठान कर अडिग भाव से जिसे गलत मानते हैं उसे मानने से इन्का्र करते रहे और आश्चणर्य यह कि यह क्रान्तिकारिता रूढि़वादी ब्राह्मणों में ही थी नवाचारी ब्राह्मण तो सुविधाओं के हाथ बिक जाते थे। रूढि़वादी ईसाइयों, रूढि़वादी ब्राह्मणों की प्रगतिशील और विद्रोही भूमिका का जिक्र हम पहले भी कर आए हैं उसे दुहराने की जरूरत नहीं।

''यह सब तुम सुना क्यों रहे हो।''

'' यह बताने के लिए कि गॉधी में एक रहस्यमय तरीके से परंपरा के जीवन्त तत्वों का नये सिरे से आविष्कार था और आधुनिकता के साथ उसका अद्भुत सामंजस्या था। ऐसा ही सामंजस्यप पूर्व और पश्चिम के तत्वों का था और ऐसा ही सामंजस्य गरम दल और नरम दल के जीवन्त तत्वों का। गांधी हिंसा का रास्ता चुनने के पक्ष में नहीं थे, परन्तु ‘’हिंसा और कायरतापूर्ण पलायन में से मैं हिंसा को ही तरजीह दूँगा।" अहिंसक मरने के डर से हिंसा से पलायन नहीं करता, मरने और पलायन करने में मरने का वरण करता है, यह रूढि़वादी ब्राह्मणों के फीरोज शाह तुगलक और औरंगजेब दोनों के जजिया के विरोध में सविनय निवेदन के साथ अपनी मॉंग रखने, मॉंग न मानी जाने पर राजादेश की अवज्ञा करने, और हाथी से कुचले जाने पर भी मरने के लिए खड़े होने वालों का एक विशाल क्षेत्र में विस्ताार हो जाना।

'गाँधी का सविनय अवज्ञा और असहयोग नरम दल के वश की बात न थी। बिना हिंसा का सहारा लिए, ‘मैं तुम्हारे गलत कानून और गलत शासन को नहीं मानता, मैं आजाद हूँ और आजाद रहूँगा और आजाद मरूँगा’ छाती तान कर नहीं कह सकता था। ऐसा व्रत लेने वालेों को भी इनके वचाव के साथ ही छुप कर रहना पड़ता और छिप कर प्रतिघात करना पड़ता था, अपनी पहचान जताने के लिए मैं झुकने को तैयार नहीं हूँ।'
'' गांधी के सत्याग्रहियों को छुपने, बचते हुए जीने और मात्र यह जताने के लिए जीने की जरूरत नहीं थी। उनके पास एक ऐसा हथियार था जिसे ले कर वे सीधे गलत कानून को चुनौती और अपनी आजादी की घोषणा ही नहीं कर सकते थे, अपने विरोधियों को नंगा भी कर सकते थे। उनमें एक अतीन्द्रिय बोध था जिसमें आधुनिकता और परंपरा, हिंसालभ्य और अहिंसालम्य लक्ष्यों का समावेश था। गॉंधी को उनके समय में भी नहीं समझा गया और उनकी गाथा गाने वालों द्वारा भी अधूरे रूप में ही समझा गया। तुम्हें क्या लगता है।''

''मुझे लगता है कि यदि मेरे हाथ में हथौड़ा होता और तुम्हें अपना मित्र समझ कर उसका तुम पर प्रयोग न करने की ठान कर बैठा होता तो भी अपने को काबू में न कर पाता और तुम्हारा सिर फटा मिलता । बात कर रहे थे कि हिंदी का आना अब इतिहास की जरूरत है और गॉंधी माहात्म्य में जुट गए। तुम पिछले जन्म मे चारण रहे होगे।

"चलो, पुनर्जन्म में तुम्हें विश्वास तो पैदा हुआ। लेकिन तुम ठीक कहते हो, मुझे न बोलना आता है, न लिखना। मैं अक्सर अपने विषय को ही भूल जाता हूँ, बोलते समय भी और लिखते समय भी। लेकिन इसका एक फायदा भी है यार। जब पता चलता है कि अरे मुझे इस विषय पर बात करनी थी और उसका तो जिक्र ही नहीं आया तो प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब इसे सलीके से कहूँगा। नतीजा वही होता है। फिर भी लाभ यह कि अपनी ही कमी को पूरा करने के लिए दूसरा लेख, दूसरी किताब आती जाती है, बाजार गरम रहता है और बात पूरी होती लगती नहीं। मरते समय कहूँगा, इसे अगले जन्म में समझाऊंगा, पर वैज्ञानिक अगले जन्म का रास्ता रोके खड़े हैं। अधूरा कहा और अधूरा लिखा है, इसे मेरे पाठक ही पूरा करेंगे। फिर भी कल मिलते हैं।

हिंदी की तरफ लौटे थे गालिब



'यह बताओ, तुम्हारे पास जादू की कौन सी छड़ी है जिससे तुम हिन्दी को भारतीय संपर्क भाषा बनने का सपना देखते हो और कौन सी ऐसी भिन्नताएं हैं जिनके कारण तुमको पाकिस्तान में उर्दू की स्वीकृति असंभव लगती है।''

''इतने सारे सवाल । मैं तो इनमें पहले का ही जवाब दे सकूँ तेा धन्य समझूँगा। पहली बात यह जादू की छड़ी न तो कभी मेरे पास थी, न ही उसकी कामना करता हूँ। छड़ी का जादू छड़ी के हटते ही टूट जाता है। मेरे पास इतिहास की एक मोटी समझ है जिसमें यह संभव प्रतीत होता है।''

''यह समझ सिर्फ तुम्हें है, और किसी को नहीं।''

''दूसरों को इतिहास की बारीक समझ है इसलिए वे इसके साथ छेड़छाड़ करते रहते हैं, इसालिए उसे समझ नहीं पाते। वे उससे डरते हैं, उसे अपनी भट्ठी का ईंधन बना कर रखना चाहते है, और लापरवाही में अपना हाथ भी जला लेते हैं। मैं उसे देखता हूँ, उसके रुख को पहचानता हूँ और उससे संवाद तक कर लेता हूँ क्योंकि उसकी संकेत भाषा समझता हूँ।''

''तब तो तुम्हारी आरती उतारनी पड़ेगी।''

''उसमें तो सीधे आग से पाला पड़ेगा और तुम अपनी दाढ़ी भी जला बैठोगे। इसलिए ऐसा जोखिम मत उठाओ, मैं तुम्हें स्वयं उसके पास ले चलता हूँ।''

''देखो, उन्नीसवीं शताब्दी में कोई इस बात का सपना तक नहीं देखता था कि यह देश कभी आजाद हो सकेगा, सिर्फ अंग्रेजों को पता था कि उनके पॉंव जमीन पर नहीं है, वे अधर में लटके हुए है, उन्‍हें यह आशंका भी थी कि 1857 के दमन का गुस्‍सा भारतीय मानस में भरा हो सकता है और कभी उग्र रूप ले सकता है। इसलिए वे तभी तक सुरक्षित है जब तक भारतीय आपस में लड़ते रहें। यह नीति उन्होंने टीपू (1799) की पराजय और उसके बाद दूसरे मराठा युद्ध में विजय (1805) और 1815 में तीसरे मराठा युद्ध में मराठा प्रतिरोध को पूरी तरह चूर करने के बाद जब कहीं से प्रभावशाली प्रतिरोध का खतरा नहीं रह गया तब अपनाई। इससे पहले वे यह मान कर चल रहे थे कि उन्होंने बंगाल की जमीन मुसलमान शासकों से छीनी थी सो मुसलमान ही उनके विरोधी हो सकते हैं, हिन्दुओं को मुस्लिम शासन से मुक्ति मिली है इसलिए वे आसानी से हमारे साथ आ सकते हैं, उन्होंने हिन्दू सभ्यता और संस्कृति का अध्ययन और इसके नकारात्मक पक्षों की उपेक्षा करते हुए केवल धनात्मक पक्षों को उजागर करने की नीति तो अपनाई ही, इस बात की सावधानी भी बरती कि मिशनरियों की गतिविधियों को काबू में रखा जाय, जिससे वे जिन हिन्दुओं का सहयोग और समर्थन चाहते हैं वे बिदक न जायँ। यह याद रखना जरूरी है कि मुसलिम प्रतिरोध बंगाल में 1857 के संग्राम के बाद भी जारी रहा और उसी से चिन्तित हो कर हंटर ने जो खुफिया विभाग के प्रधान रह चुके थे मुसलमानों को हिन्दुओं के विरुद्ध करने या कहें आपसी झगड़े लगा कर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का रास्ता अपनाया था।

''तुम किसी बात को इतना फैला देते हो, यदि मुझे तुम्हारी बीमारी को नाम देना हो तो इसे डायलोफीलिया नाम दूँगा और तुम्हें समझाने का प्रयास करूँगा कि तुमको किसी अस्पताल में भर्ती हो जाना चाहिए।''

''और यदि मैने पूछ लिया कि कौन सा अस्पताल तो तुम उसका नाम बताओगे जिसमें तुम आते जाते रहते हो। तुम्हें अपने अस्पलताल से भी प्रेम है और अपने आप से भी, और तुम जो अच्छे नंबर लाते रहे हो वह हिस्ट्री मेड ईजी, साइंस मेड ईजी, यूनिवर्स मेड ईजी जैसी किताबें पढ़ कर। तुम्हें झटपटिया ज्ञान है और मैं तुम्हें उस मनोविश्लेषण से गुजारना चाहता हूँ जिसमें अवचेतन की गहराइयों में उतर कर समस्याओं का कारण समझा जाता है, समाधान वहॉं नहीं मिलता। समाधान कारण को जानने के बाद हमें ही तलाशना होता है। 
"तुम्हें आज इतनी ही खूराक काफी है। पहले इसे पचा लो तो उन गॉंठों पर बात करेंगे जिनसे मुक्ति के बिना हम राष्ट्रकवि की उन सरल पंक्तियों का भी अर्थ नहीं समझ सकते जो निरक्षरों को भी बोधगम्य लगती हैं : 

हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी।

अब इस तथ्य पर ध्यान दो कि मध्यकाल में शासकों के जो भी अन्याय रहे होंं सामान्य हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कटुता न थी । इसका प्रधान कारण यह था कि मुसलमानों का नब्बे प्रति शत धर्मान्तरित हिन्दू थे जिन्हें विवशता में ऐसा करना पड़ा था। इसलिए दफ्तरों की भाषा जो भी रही हो आम बोलचाल की ज़बान ऐसी थी जिसमें कुछ अरबी फारसी के शब्द थे जबान हिन्दी थी, हिन्दी ही कही जाती थी ।
सभी मुसलमान अपने क्षेत्र की बोली जानते और बोलते थे। विदेशी मूल पर गर्व करने वाले आपस मे तुर्की या फारसी बोलते थे । कविता करते समय उनकी जबान में कुछ ऐसे शब्द भी आ जाते थे जो आम बोलचाल में नहीं आए थे । पर इसे एक दोष माना जाता था । मीर का यह कथन कि 'क्या जानूँ लोग कहते हैं किसको सरूरे कल्ब । आया नहीं है लफ्ज ये हिन्दी जबाँ के बीच।' इस सचाई को बयान करने के लिए काफी है । हाली के बारे में एक बार शमशेर बहादुर सिंह ने बताया था कि वह शब्द विचार के मामले में कहते थे कि हमारे घर में । इसके लिए यह बोला जाता है, अर्थात महिलाओं की बोली को वह भाषा की कसौटी मानते थे। जौक ने गालिब की भाषा का मजाक उड़ाते हुए कहा था मजा कहने का जब है एक कहे और दूसरा समझे, मगर इनका कहा ये आप समझें या खुदा समझे । गरज नाम भले उर्दू भी चलन में आ गया था पर उसका मतलब भी हिन्दी या आम बोलचाल की भाषा ही था, इसलिए भाषा को लेकर हिन्दू मुसलमान का फर्क न था । गालिब भी अपनी चूक सुधारने की ओर मुड़े थे । उनके वे ही शेर लोकप्रिय हैं जो आम जबान और मुहावरों में हैं। यह अलगाव 1870 के बाद प्रयत्न पूर्वक पैदा किया गया और इसी तरह गोकुशी को सह दे कर, कराने की कोशिशें शुरू हुंईं कि जिससे उनके कसाईखानों की ओर ध्यान न जाय। इसे प्रचारित जान बूझ कर किया जाता था। इसको खुले आम कराने के प्रयत्न के बाद भी ऐसा विरल मामलों में ही होता था ।
'तुम फिर बहक रहे हो।'
'तुम ठीक कहते हो । यह समझो कि औरंगजेब ने भी अपनी मौत को निकट जान कर जो 
दर्द और अफसोस भरा, लगभग आत्मग्लानि भरा पत्र दक्षिण भारत से अपने पुत्र को लिखा था उसे मुस्लिम शासकों के व्यवहार में एक मोड़ माना जा सकता है जिसमे भारतीय जमीन और जन से जुड़ने की तड़प साफ देखी जा सकती है यही कारण है 1857 में । हिन्दू मुसलमान दोनों में इतना एका पैदा हो सका।
"यह पँवारा तुम क्यों दुहरा रहे हो?"
"यह याद दिलाने के लिए कि उन्नीसवीं सदी में भारतीय समाज अधिक एकजुट था, कि 1857 का संग्राम हमारे जातीय आक्रोश की अभिव्यक्ति था, उसका लक्ष्य ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने का था, जबकि सैयद अहमद का अभियान और कांग्रेस का लक्ष्य अपने और अपनों के लिए रियायतें माँगने का था। इसमें नजर किसको क्या मिला इस पर थी और जब इसने डोमिनियन स्टेटस या स्वतन्त्रता की माँग करना शुरू किया तब भी इसमें ऐसों का बोलबाला था जो अपने लिए कुछ चाहते थे और लगे हाथ कुछ देश को भी मिल जाय तो उस पर उन्हें आपत्ति न थी।

आत्मघात



‘’यह बात तो किसी से छिपी नहीं है कि देश का बँटवारा उर्दू भाषा को लेकर हुआ था और तुम यह दिखाना चाहते हो कि सब कुछ ठीक ठाक था, मसला लिपि का था।‘’
‘’देखो, भाषा तो बहाना थी। बँटवारा इस दहशत के कारण हुआ था कि भारत स्वतन्त्र होगा तो लोकतंत्र की स्थापना होगी। शासन बहुमत के हाथों में होगा जिसका मतलब है राज्य हिंदुओं का होगा और वह बदले की भावना से काम करेंगे। यह उनकी सोच नहीं थी, मन्त्र फूँक कर, हतचेत करके, इसे उनकी जहन में उतार दिया गया था। उन्होंने हिन्दू‍ इतिहास को ध्यान से पढ़ने तक का प्रयत्न नहीं किया, अन्यथा वे समझते कि जिन मूल्यों ने ही भारत को मुस्लिमबहुल देश होने से बचाया, ईसाइयत का प्रतिरोध किया उन्हीं ने उन उत्पीड़क कर्मों से उसे बचना सिखाया, जिनके कारण एक प्रभावशाली मुस्लिम नेता ने पाकिस्तान बनाने के समर्थन में यह तर्क किया था कि जिन्हें वे अपना नायक मानते हैं उन्हें हिन्दू खलनायक मानते है, और जिन्हें हिन्दू अपना नायक मानते हैं, उन्हें वे खलनायक मानते हैं, इसलिए दोनों समुदाय साथ नहीं रह सकते। 
" वे अपने ही मध्यकाल की यादों से डरे हुए थे और अपने ही मूल्य मानों के कारण डरे हुए थे, क्योंकि वे सोचते थे कि वे जैसा आचरण करते आए हैं वैसा ही दूसरा भी करेगा। यह उनकी सीमा नहीं थी, एकेश्वरवादी सोच की सीमा थी, जिसमें भिन्न मान्यताओं, विचारों, दृष्टियों के लिए तो स्थान होता ही नहीं, आत्मनिरीक्षण तक के दरवाजे बन्द कर दिए जाते हैं और भावना विवेक पर इस तरह हावी हो जाती है कि देखने और जॉंचने की इच्छा‍ तक मर जाती है। अन्यथा मुस्लिम नेताओं ने देखा होता कि मध्यकाल के मुस्लिम शासकों, प्रशासकों और सिपहसालारों के कारनामों के अनुभव के बावजूद किसी हिन्दू राजा या रानी ने मुसलमानों के साथ दुराव तक का व्यवहार नहीं रखा, अत्याचार की तो बात ही दूर है, यद्यपि कई बार इस सद्विश्वास के कारण उन्हें क्षति भी उठानी पड़ी, किसी ने अपने अधिकार क्षेत्र में भी उनके साथ प्रतिशोध या अविश्वास तक का प्रमाण नहीं दिया। जिस मूल्य व्यवस्था ने धर्मान्तरण से बचाया उसी ने इतर धर्मियों का उत्पीड़न करने से भी रोका।‘’
’’यह बताओ, तुम्हें कभी किसी पागल कुत्ते ने काटा था। याद करो, हो सकता है बचपन में काटा हो और सूइयॉं लगी हों, कहने के लिए तुम ठीक हो गए हो, पर जहर तो जहर है यार, उसका हल्का असर कब तक बना रहे कौन जानता है।‘’
’’मैं तुम पर हँसना चाहता हूँ पर हँस इसलिए नहीं पाता कि तुम्हें दु:ख होगा।‘’
’’मैं तुम पर हँसते हुए यह सोच कर रोता रहता हूँ कि तुम घूम फिर कर उसी हिन्दू-मुस्लिम सवाल पर क्यों लौट आते हो। तुम इतने प्यारे दोस्त हो, विचार नहीं‍ मिलते तो क्या, मैं बड़ी पीड़ा के साथ पागल कुत्ते के काटने का मुहावरा तलाश पाया था। उपमा का क्या बुरा मानना।‘’
"परन्तु कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके लिए उपमा तक तलाशने चले तो उपमा दहशत में पीछे हट जाती है। उनमें ही तुम हो । मैं भाषा पर बात कर रहा था और तुम विभाजन पर पहुँच गए और उसका विवेचन किया तो मुझे ही उस बीमारी से ग्रस्त बता दिया जिसका प्रमाण तुम स्वयं दे रहे थे।
‘’सच कहो तो जिस भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव था वह हिन्दी‍ नहीं, हिंदुस्तानी थी, जिसमें अरबी फारसी शब्दों के प्रयोग की पूरी छूट थी। उसकी कसौटी थी बोधगम्यता, परन्तु उसको ले कर बहुत चर्चा नहीं हुई थी क्योंकि भाषा केन्द्रीय समस्या थी नहीं, वह मात्र ओट थी। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने जो हिंदी-तमिल, हिन्दी-कन्नड आदि कोश तैयार कराए थे उनमें फारसी अरबी के शब्दों संख्या बहुत अधिक थी और उन छोटे कोशों में जिन्हें शब्दसंग्रह कहना अधिक उचित होगा, ऐसे फारसी और अरबी के शब्द भरे हुए थे जिनका शायद ही कोई प्रयोग करता हो । ज्ञानमंडल के हिन्दी शब्दकोश में फारसी और अरबी शब्दों को बहुत उदारता और विवेक से स्थान दिया गया है। मुस्लिम अभिजात वर्ग का आग्रह अरबी लिपि में लिखित भाषा पर था और इसके पीछे अपनी धौंस जमाने की आकांक्षा अधिक प्रबल थी, अपनी भाषा से प्रेम कम । इसमें प्रगतिशील और दकियानूस का फर्क नहीं था।
"बीमारी भी पुरानी थी। यह विवाद 19वीं शताब्दी में ही पैदा हो गया था और इसमें जान बीम्स की बहुत सक्रिय भूमिका थी, जो परोक्ष रूप से मुसलमानों को इस बात के लिए उकसा रहे थे कि वे अपनी भाषा को अधिक अरबी फारसी मंडित करें, इसे मुसलमानों की भाषा मानें और हिन्दू इसके जवाब में अधिक संस्कृतनिष्ठ भाषा अपनाएँ, जब कि फैलन बोलचाल की शब्दावली की वकालत कर रहे थे। यह नूरा कुश्ती थी। इसकी चर्चा यहॉं उचित न होगी। उनकी यह चाल सफल रही और हिन्दी‍ और उर्दू के पक्षधर उनकी इच्छा पूरी करने लगे थे। हंटर के सामने अपने बयान में सैय्यद अहमद का यह कथन कि ‘उर्दू शरीफों की जबान है और हिंदी गँवारों की जबान‘ और इससे तिलमिला कर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का यह फिकरा कि उर्दू नाचने वाली लड़कियों और तवायफों की जबान है। धनी हिन्दु्ओं की बिगड़ी औलादें और ढीले ढाले चरित्र के नौजवान जब रंडियो, रखैलों और भड़ुओं के बीच होते हैं तो उर्दू बोलते हैं।‘ उस जाल में दोनों समुदायों के नेताओं के फॅसने के प्रमाण हैं। भारतेन्दु स्वंयं भी उर्दू में शायरी करते थे और सन्तुलित चित्त से ऐसी बात नहीं कह सकते थे, पर जवाब तो देना ही था। शब्दों के मामूली फर्क से सैयद अहमद बीम्स के जुमले को ही दुहरा रहे थे तो इसकी प्रतिक्रिया में भारतेन्दु उस पाले में पॉंव रख रहे थे जिसमें बीम्स ने हिन्दी को दरिद्र भाषा सिद्ध करते हुए यह सुझाया था कि हिन्दी में तकनीकी शब्दावली का अभाव ही नहीं है, वैसी शब्दावली बन ही नहीं सकती। हिन्दीं को संस्कृतनिष्ठ बनाने की बीमारी के पीछे यही कारण था अन्यथा हिन्दी के संस्कृतज्ञ भी बोलचाल में संस्कृत के तदभव पदों का ही प्रयोग करते थे। भारतेन्दु स्वयं आजीवन इस बीमारी से बचे रहे।
‘’दुखद यह है इन दोनों फिकरों का खुमार जनमानस पर लम्बे समय तक बना रहा इसके कारण हिंदी उर्दू दोनों की प्रतिष्ठा को अघात पहुंचा । इसका सबसे खतरनाक परिणाम मुस्लिम समुदाय का दबे सुर से अंग्रेजी का पक्षधर हो जाना था। यदि अरबी लिपि में लिखित उर्दू राष्ट्र भाषा न बनी तो उस हिन्दुस्तानी से अच्छा है अंग्रेजी ही जारी रहे। परन्तु इसका सबसे बड़ा नुकसान स्वयं अरबी लिपि में उर्दू के हिमायतियों को ही उठाना पड़ा। देश बँट गया पर न उर्दू पाकिस्तान के कामकाज की भाषा बनी न हिन्दी भारत के कामकाज की और इसका कारण भाषाप्रेम का पाखंड रच कर अपना स्वार्थ साधन था।
हम कहें इस खींच-तान का यह असर तो हुआ ही कि अपनी भाषा के प्रति हिन्दी-प्रदेश में हिन्दी़ या उर्दू के प्रति वह गहरा लगाव नहीं पैदा हो सका जो दूसरे प्रदेशों में देखने में आता है। हिन्दी भाषी क्षेत्र भग्नमनस्कता का शिकार बना रहा और आज भी है। जो भी हो भाषा और संस्कृति की आड़ में देश का विभाजन हो जाने के बाद भी न हिन्दी भारत की सरकारी काम काज की भाषा बनी न पाकिस्तान की राष्ट्राभाषा घोषित होने के बाद भी उर्दू।
‘’भारत की बात अलग है, पाकिस्तान के बारे में तुम ऐसा नहीं कह सकते।‘’
‘’मेरी जानकारी ही कितनी है कि कुछ कहूँ, मैं तो डान में प्रकाशित एक लेख की ओर तुम्हारा ध्यान ले जाना चाहता हूँ जिसके बाद मुझे कुछ कहने की जरूरत ही न होगी। इसके लेखक ने इसे शेयर करने की अनुमति दे रखी है इसलिए इसे शेयर करना ही समझ सकते हो:
The status of Urdu is a major issue which does not seem to be getting its due share of attention; in fact it seems to be getting no attention at all, either by the government or by the citizens. Current policies and trends have seen a pathetic downfall in the status of our national language.
The language policy according to the Constitution of Pakistan is
1. The national language of Pakistan is Urdu, and arrangements shall be made for it being used for official and other purposes within 15 years from the commencing day.
2. The English language may be used for official purposes until arrangements are made for its replacement by Urdu (Article 251 of the Constitution of the Islamic Republic of Pakistan, 1973)
It has been 62 years but unfortunately our government has failed to take appropriate measures to replace English with Urdu.
The status of Urdu is a major issue which does not seem to be getting its due share of attention; in fact it seems to be getting no attention at all, either by the government or by the citizens. Current policies and trends have seen a pathetic downfall in the status of our national language.
The language policy according to the Constitution of Pakistan is
1. The national language of Pakistan is Urdu, and arrangements shall be made for it being used for official and other purposes within 15 years from the commencing day.
2. The English language may be used for official purposes until arrangements are made for its replacement by Urdu (Article 251 of the Constitution of the Islamic Republic of Pakistan, 1973)
It has been 62 years but unfortunately our government has failed to take appropriate measures to replace English with Urdu.
We have seen nations progressing because of taking pride in their national language and their identity but we on the other hand are content with hiding our real identity and feel 'embarrassed' in relegating the status of our national language. We consider those backward who prefer to talk in Urdu while speaking in English has become a symbol of status.
Another problem relevant to the language issue is the flaw in our educational system. It was the government's responsibility to take proper steps to raise the status of Urdu among citizens which could very well have been achieved through the educational system.
But there is no unanimous educational system in Pakistan. In majority of the systems, English is made compulsory and students are encouraged to talk in English which not only suppresses their love for their national language but also makes the students studying under Urdu-based systems victims of inferiority complex.
Furthermore, citizens are forced to learn English for better job opportunities. Is this supposed to be the policy of a country with Urdu as the national language?
Another point which I would like to add here is that the current trend of writing Urdu in Roman script in SMSs and emails has led to further deterioration in the language's quality. Mobile phones with Arabic are available in our country, then why not those with Urdu?
It's high time the government took essential steps like revising the education policy and promoting Urdu writing, debates and poetry competitions on the national level.
The people, especially the youth of Pakistan, should participate in this by bringing about a change in their thoughts and reunite for this cause.
FARIHA SAGHIR 
Karachi