मकड़ी का जाल


मैं आज की चर्चा अपने एक मित्र के पत्र से करना चाहूँगा। पत्र निम्न प्रकार है: “--- 1975 में मैंने बीएचयू में तमिऴ सीखी। पहले दिन हमारे लेक्चरर डॉ एन अरुण भारती ने कहा कि हिंदी और तमिऴ में कोई अंतर नहीं है। और मैंने तमिऴ को ऐसे सीखा जैसे मैं हिंदी को नए रूप में पढ़ रहा हूँ। फिर पूरी ज़िंदगी भारतीय भाषाओं के बीच एका तलाशता रहा। नौकरी के आख़िरी तीन साल मैंने मंगळुरु में बिताए। मंगळुरु में दो मंदिर, मंगळादेवी तथा कद्री-मंजुनाथ, बाबा गोरखनाथ ने स्थापित कराए हैं। मेरे मन में प्रश्न उठा कि गोरखनाथ मंगळुरु आने के रास्ते किन भाषाओं में बात किए होंगे, मुँह पर टेप तो लगाए नहीं होंगे। क्या वह भाषा अंग्रेज़ी थी। यहीं पर भाषाओं को बाँटने वाली अवधारणा ध्वस्त हो जाती है। कुंभ-काशी क्या अंग्रेज़ों ने शुरू कराया। मंगळुरु की तैनाती के दौरान मैंने कन्नड़ सीखा और उत्तर-दक्षिण की भाषाओं के विभाजन रेखा को कृत्रिम पाया। कई शब्द हैं दो तुऴु, कन्नड़ और हिंदी में कॉमन हैं। जैसे काला को तुऴु और पूरबी हिंदी में करिया बोलते हैं। ध्यान रहे कि तुऴु और पूरबी हिंदी आदि भाषाएँ हैं। हिंदी का तो अभी जन्म ही हुआ है। मैं जानना चाहता हूँ कि भारत की भाषाओं में कब अलगाव के बीज बोए गए। इसका राजनैतिक अध्ययन भारत के जोड़ने के लिए तुरंत ज़रूरी है।‘’ (बिकास कुमार श्रीवास्तव !) 
आगे कुछ कहने से पहले मैं यह बता दूं कि मैं जब भारत की अनेक भाषाओं के उदाहरण देते हुए अपनी बात कहता हूं तो यह भ्रम पैदा नहीं होना चाहिए कि इन में से किसी की मेरी बहुत अच्छी जानकारी है। कोशिश की सारी भारतीय भाषाओं को सीख लूं परंतु अभी सबकी लिपियां लिखना, व्याकरण समझना पूरा भी नहीं हुआ था, कि उनसे उभरने वाले प्रश्नों के दबाव में भाषा शिक्षा आधी अधूरी छोड़ कर भाषा विज्ञान और वैदिक अध्ययन की और मुड़ गया। फिर इस दिशा में आगे बढ़ पाता कि बीच में इतिहास और पुरातत्व से इनकी गुत्थियों को समझने का दबाव पैदा हुआ और जो संभव था किया। मेरे पास ज्ञान कम भटकाव अधिक है। शब्दभंडार दक्षिण की भाषाओं का कार्यसाधक तक नहीं कहा जा सकता। लिपि सीखने का एक लाभ है कि शब्दकोशों का उपयोग कर लेता हूँ। परन्तु मैं दक्षिण भारत की भाषाओं के विशेषत: तमिल, तेलुगू और कन्नड के महत्व को समझता हूँ और उनके स्वरमाधुर्य से भी परिचित हूँ और चाहता हूँ कुछ लोग ऐसे हों जो इनमें बोलने और लिखने की क्षमता ही अर्जित न करें अपितु उनके अधिकारी विद्वान बनें। मैं वास्तव में अभी अस्पृश्यता और सांप्रदायिकता के ही कुछ पहलुओं पर बात करना चाहता था, पर विषयान्तर हो गया तो पहले उस टेपेस्ट्री या तारवर्की की बात कर लें, उस लगाव को समझ लें, फिर अलगाव की ओर ध्यान देंगे।
हमारे यहाँ भाषाओं के विषय में ऐतिहासिकता की ओर ध्यान अधिक नहीं रहा, भौगोलिकता पर ध्यान अधिक था। कहते हैं, चार कोस पर भाषा बदल जाती है, परन्तु कई बार एक ही गांव में प्रत्येक परिवार की भाषा में एक सूक्ष्म अन्तर वहाँ पैदा होता है जहां पड़ोसी भिन्न भाषाई क्षेत्र की कोई स्त्री परिवार में प्रवेश करती है और स्थानीय बोली को सीखने के क्रम में कुछ समय तक अधगूँगी और फिर मिश्र बोली बोलते हुए पति के परिवेश की भाषा को सीखती बोलती है, और अपनी भंगी, मुहावरे आदि इस पारिवारिक परिवेश में बो देती है। मेरी विमाता मेरे गाँव से चालीस किलोमीटर पूर्व के एक गॉव की थी जिससे हमारे गाँव की रिश्तेदारियाँ थी वहाँ सम्मान सूचक आप के लिए रउऑं चलता है, हमारे यहाँ रउरे, (पर इसका प्रयोग अति नम्रता क द्योतक होता है इसलिए सामान्यत: नहीं किया जाता) वहाँ न के लिए नू चलता है। यहाँ माँ को अपने पुराने प्रयोग से हटना पड़ा, परन्तु उसके शब्दभंडार के कुछ विशिष्ट शब्द थे। जैसे निपट मूर्ख के लिए भकभेल्लर, गमखोर के लिए भर्त्सनापूर्ण गबड़घूइस। इसे हम समझते थे पर इसका प्रयोग स्वयं नहीं करते थे। छोटे भाई की पत्नी उससे कुछ दक्षिण के लगभग उतने ही दूर के क्षेत्र से आई थी, वह अभिधा में बात करना पसन्द नहीं करती। प्रत्येक अभिव्यक्ति के लिए उसके पास एक मुहावरा है। मेरे शहर गोरखपुर में अवध के नवाब ने इमाम की नियुक्ति की थी और उनके साथ कुछ मुसलमान अवध से ही भेजे थे, और मेरे अपने गॉव में अयोध्या से केवटों को आमन्त्रित करके और सुविधा दे कर बसाया गया था जिनके वंशधर आज सात आठ गाँवों में बिखरे हुए हैं, पर कुछ अपनी अवधी भूल चुके हैं और कुछ आज भी अवधी पुट के साथ भोजपुरी बालते हैं। यही हाल गोरखपुर शहर के अवध से आए मुस्लिम परिवारों की है। स्त्रियों की भाषा में कुछ शब्दों और मुहावरों का प्रयोग होता है जिन्हें पुरुष समझते हैं पर बोलते नहीं। बोलें तो स्त्रैण माने जाएंगे। यह मुंडारी में परिगणित किसी बोली का प्रभाव है जिसमें आज भी कुछ बोलियों में स्त्रियों और पुरुषों की भाषा में अन्तर इतना भेदक है कि यदि स्त्री स्त्री से बात करेगी तो भाषा अलग होगी, स्त्री पुरुष से बात करेगी तो भाषा अलग होगी और पुरुषों की बोली अलग होगी, परन्तु पुरुष भी जब महिलाओं से बात करेंगे तो उनमें शालीनता आ जाएगी। इसे अपने आस पास के लोगों में आप भी लक्ष्य कर सकते हैं कि पढ़े लिखे पुरुष तक जिन अशोभन शब्दों और मुहावरों का आपसी बातचीत में प्रयोग करते हैं उनका प्रयोग वे न तो किसी स्त्री से बात करते हुए कर सकते हैं न ही यह जान लेने पर कर सकते हैं कि श्रव्य दायरे में कोई स्‍त्री भी है। भाषा के तथ्य और व्यवहार के बीच दूरी, भौगोलिक दूरी, इनके संगम स्थलों की विचित्रता के बीच चल रहे इन तारों और कशीदों पर ध्यान दें तो भाषा एक ऐसा उद्यान जैसा प्रतीत होगी जिसमें प्रत्येक पौधा अलग होते हुए भी एक ही परिवेश में नहीं है, एक ही वृक्ष के एक जैसे दिखने वाले पत्तों में भी ऐसी भिन्नता है कि समान प्रतीत होते हुए भी कोई पत्ती दूसरी किसी पत्ती के सर्वसद़श और समान नहीं है। इनमें से कुछ बातों की ओर भाषावैज्ञानिकों ने ध्यान दिया है, कुछ की ओर अपनी लाज बचाने के लिए ध्यान दे ही नहीं सकते थे, जब तक कोई इनका भाषाशास्त्रीय विवेचन करने की ही न ठान ले तब तक ऐसा अध्ययन अनुपयोगी भी होगा। निष्कर्ष यह कि भिन्नताओं को अतिरंजित तूल दें तो घरों, परिवारों, अंचलों को भी भाषा के सवाल पर भी एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा सकता है, और लगाव पर ध्यान दें तो उस छोर तक को अपना बनाया जा सकता है जहाँ तक भाषा के हमारे तार पहुँचते और एक नई रंगत लेकर हम तक वापस लौटते रहे है जिसे लक्ष्‍य करते हुए इमेनो ने भारत को एक भाषाई क्षेत्र माना था। भाषा की इस कशीदाकारी को समझने वाले घबरा जाते हैं क्योंकि यह उन सभी अध्यासों का, सभी मिथ्या प्रतीतियों का जवाब है, जिन्हें ज्ञात कारणों से प्रचारित किया और बेहयाई से जारी रखा गया और इसलिए पाश्चात्य भाषावैज्ञानिक इसको जानते हुए भी इसे अपने विवेचन में स्थान नहीं देते जब कि वे व्यक्तिगत भाषा या ईडियोलेक्ट तक को लक्ष्य कर चुके हैं।
पहले यात्राएं पैदल ही होती थी इसलिए साधुओं आदि को एक गॉव से दूसरे में पहुँचते ठहरते और एक बोली क्षेत्र को पार करने में ही इतना समय लग जाता था कि वे इस विषय में अतिरिक्त सजगता के बिना ही अनेक भाषाएं सीखते और बोलते आगे बढ़ते जाते थे। गोरखनाथ के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा।
फिर भी विद्वानों के बीच एक मोटा भ्रम यह था कि भारत की सभी भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं अत: भिन्नता के बाद भी पृथकता या अलगाव की चेतना नहीं थी। लोग अपनी बोली से इतने आसक्त होते थे कि उससे भिन्न कथन या उच्चारण का उपहास करते थे। परंतु साथ ही यह एक दुविधा भी थी की बहुत से ऐसे शब्द हैं जिन की व्याख्या संस्कृत से नहीं हो पाती। इसकी ओर ध्यान बहुत बाद में गया। संभव है हेमचन्द्र की देसी नाममाला के माध्यम से, पर मेरा अध्ययन इस क्षेत्र में इतना कामचलाऊ है कि मैं यह नहीं कह सकता कि उनसे पहले, मिसाल के लिए वररुचि ने इस पर ध्यान न दिया होगा फिर भी हुआ तो बाद का ही । और इस बोध के बाद भी अलगाव की भावना न थी, कुछ प्रश्न थे जिनका कोई हल तलाशना था। यह उत्तर से ले कर दक्षिण तक व्याप्त धारणा थी।
बांटने का काम मध्यकाल के शासकों ने नहीं किया। उन्होंने सताया, मारा, उत्पीडि़त किया पर दिलों पर चोट न की। ठीक किया, यह तुम कह सकते हो, तुलसी दास को तो शिकायत दंड की करालता से ही थी, ‘साम न दाम न भेद कछु केवल दंड कराल। भारतीय साहित्य से परिचित होने से पहले यूरोपियनों का भी एक ही हथियार था, दंड कराल। भारत में आकर उन्होंने साम, दाम और भेद से परिचय पाया और इसे अपनाया। उनका उससे पहले का इतिहास देखो, भारत से बाहर के देशों और उपनिवेशों के साथ उनके बर्ताव को देखो तो मेरी बात तुम्हारी समझ में आ जाएगी। यह सच है कि दाम का प्रयोग मध्यकालीन शासकों ने भी किया। अकबर से लेकर औरंगज़ेब तक अपनी अनेक लड़ाइयों में रिश्वत के बल पर विजय पा सके थे और उस रिश्वतखोरी को अंग्रेजों ने अपना औजार बनाया परंतु तुलसीदास ने जिस दाम की बात की थी वह इससे भिन्न थी जिसकी ओर मुड़े तो शामत आ जाएगी। परन्तु यह याद दिलाना जरूरी है कि हम पराधीन हुए इसके बाद भी विजेताओं ने हमसे बहुत कुछ सीखा, चुपचाप पचा ले गए कि लगे यह उनकी परंपरा में था, परन्तु हम उनसे कुछ नहीं सीख सके। गुलामी मन, आत्मा और मस्तिष्क के समर्पण से आती है, सामरिक पराजय से नहीं।
जिस आदमी ने दक्षिण को उत्तर भारत से अलग किया उसका इरादा कलह पैदा करने का यदि रहा भी हो तो उसके कारनामों से ऐसा लगता नहीं। वह मानता था कि फोर्ट विलियम कॉलेज में पढ़ाई जाने वाली या विकसित की जाने वाली भाषाएँ दक्षिण भारत के लिए उपयोगी नहीं, इसलिए मद्रास (चेन्नइ) में वैसा ही एक कॉलेज दक्षिण भारत की भाषाओं के विकास के लिए स्थापित किया जाना चाहिए। उसकी नजर में बँटवारा नहीं, प्रशासन था और अभी तक मैकाले का भाषा सिद्धान्त सामने नहीं आया था। इस व्यक्ति का नाम था एलिस। पूरा नाम Francis Whyte Ellis था जो मद्रास में कलेक्टर के पद पर नियुक्त हुआ था। उसके सहयोगियों में थे विलियम्स एर्कसिन और जान लीडेन और उन्होंने पहली बार इस बात का प्रमाण जुटाया कि दक्षिण भारत की भाषाएं उत्तर भारत की भाषाओं से भिन्न है।
बांटने का काम अंग्रेजों ने उसके बाद आरंभ किया जब उनको भारत के विशालतम भू भाग पर अधिकार मिल गया, प्रतिस्पर्धी फ्रांसीसी शक्ति भारत से लुप्तप्राय हो गई और उन्हें विश्वास हो गया कि अब उनका प्रतिरोध करने वाली कोई शक्ति भारत में बच नहीं रही।
कॉल्डवेल इसी दौर में आते हैं। उन्होंने जिस समय अपना काम संभाला उस समय तक दूसरे अनेक विद्वान दक्षिण भारत और उत्त‍र भारत की भाषाओं के संबंध पर विचार कर चुके थे। इसकी कुछ झलक कॉल्डवेल की पुस्तक की भूमिका में भी मिल जाएगी। यदि आप किताब को ध्यान से पढ़ें तो पाएंगे कि वह न केवल उत्तर भारत को दक्षिण भारत से काटने की कोशिश कर रहा था अपितु तमिलों को मलयालियों से भी, श्रीलंका में बसे और जमे हुए तमिलों के विरुद्ध लंकावासियों को भी खड़ा कर रहा था, परन्तु उसने अपना काम इतनी ,खूबसूरती से किया कि किसी को पक्षपात का संदेह तक न हो।
अपनी अनेक सीमाओं के बावजूद कॉल्डवेल की पुस्तक आज भी बहुत महत्वपूर्ण है और उससे अनेक ऐसे पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है जिनको हम उसके खिलाफ इस्तेमाल भी कर सकते हैं। उदाहरण के लिए उसने प्रतिपादित किया कि द्रविडियन भाषाएं संस्कृत से निकली नहीं हो सकती, परन्तु साथ में यह भी कहा कि तमिल दक्षिण की भाषाओं में सब में अधिक रूढ़िवादी भाषा है। उसने एक अन्य संभावना ओर भी संकेत किया कि संस्कृत स्वयं तमिल जैसी किसी बोली से निकली है या नहीं इस पर अवश्य विचार किया जा सकता है। यह दूसरा विचार बहुत रोचक था और उस मान्यता को चुनौती देता था जिससे भारत पर आर्यों के आक्रमण की बात की जाती थी यदि संस्कृत तमिल जैसी किसी भाषा से निकली हुई भाषा है तो इसका विकास भारतीय भू भाग में हुआ और उन्नत विकास होने के बाद इसका प्रसार देशांतर में हुआ। यह इसमें ध्वनित था इसलिए उसने इस विचार को आगे नहीं बढ़ाया। यह काम हमारे भाषाविदों और भाषाविज्ञानियों का था जो अपना काम ठीक न कर पाए। 
मैं तो दक्षिण और उत्तर की भाषाओं के बीच के उस सूचीकर्म या तारवर्की को भी सामने लाना चाहता था जिससे मकड़ी के एक विशाल जाले का चित्र उभरता है, परन्तु इसे समझना कौन चाहेगा।

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तोड़ता हूं इस तिलि‍स्म को

यह बताओ तुमने शिगूफा छोड़ने के लिए ऐसा कह दिया कि हिन्दीेभाषियों के लिए तमिल का अध्ययन उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना संस्कृत का, या सचमुच ऐसा ही मानते हो?’’
’’तुम्हें क्या लगता है ? तुम जानते हो, मैं विनोद में भी झूठ नहीं बोलता। यथार्थ में ही इतना विद्रूप भरा हुआ है कि विनोद के लिए वही काफी है। उसे देखने की नजर और बयान करने की भाषा भर चाहिए। मेरे फेसबुक के एक मित्र ने लिखा कि आपने तो उत्तर दक्षिण को जोड़ दिया । मैं आधुनिक भागीरथ होने का सपना तक नहीं देखता। मैं क्या जोड़ूंगा उत्तर को दक्षिण से, इतनी सामर्थ्य नहीं। मैंने एक बार कहा था, मैं द्रष्टा हूँ, ज्ञाता नहीं। इसके साथ यह भी जोड़ लो कि आविष्कर्ता तक नहीं। मौलिक होने से घबराता हूँ। प्रामाणिक होने का प्रयत्न करता हूँ। जो देखता हूँ उसे यदि लोक विश्वास से भिन्न पाता हूँ तो बताता हूँ, तुम जो मानते हो वह सही नहीं है। देखो, यह तो ऐसा है, यह है, और इस कारण तुम को ऐसा दिख रहा है। दुर्भाग्य से मैं एक ऐसे समाज में अपनी बात रखने का प्रयत्न करता रहा हूँ जिसमें लंबी दासता के कारण आत्मविश्वास और आत्मसम्मान दोनों का अभाव है। वह इन शब्दों का अर्थ तक भूल गया है। वह दुराग्रह या हठ को आत्मविश्वास और अहंकार को आत्मसम्‍मान समझता है और इसमें सर्वाधिक शक्ति और अवसर उस व्यक्ति के पास होता है जो दासता के मूल्यों में दूसरों से आगे होता है। वह स्वतंत्रता का सम्मान करता है, पर यह नहीं जानता कि स्वतन्त्रता होती क्या है, जैसे वह आत्मविश्वास और आत्मसम्मान पाना चाहता है पर यह नहीं जानता कि आत्मविश्वास और आत्मसम्मान होता क्या है। जानते हो मैंने यह देखा कि जो इतिहास हमें पढ़ाया जाता है, जो भाषाविज्ञान हमें पढ़ाया जाता है वह गलत है तो मैंने एक व्रत लिया था कि इसे मैं सुधारूँगा और इसे अपनी एक कविता में व्यक्त किया था जो मेरे एकमात्र काव्यसंग्रह अपने समानान्तर की पहली कविता है। इसे मेरे मित्र नवल ने अपने सहज स्नेह से आग्रहपूर्वक प्रकाशित किया था, जिसमें मेरी संक्षिप्त टिप्‍पणी 6 दिसम्बर 1971 की है जिसमें लिखा है ’अपने समानान्तर’ में मेरी 1968-69 में लिखी गयी कविताएं संकलित हैं। सो यह प्रतिज्ञा भी इसी बीच ली गई होगी। इस कविता में की गई प्रतिज्ञा ने ही मुझे, मैं जो कुछ हूँ, बनाया है, इसलिए इसे देखो। कवियों को यह पसन्द न आएगी क्योंकि यह नारे जैसी कविता है जिसमें संकल्प होता है, कवित्व की नाजुकी नहीं होती, पर नारे लिखने वाले कवि भी समाज में होने चाहिए। कविता को सुन सको तो सुनो:
मैं फिर तोड़ता हूं इस तिलि‍स्म को 
जिसमें मैं क़ैद था 
और गढ़ता हूँ एक नया तिलि‍स्म
अपने नाखून की मैल से।
मैं बनाने जा रहा हूं एक सुरंग 
जो तुम्हारे दिल और संसद भवन में एक साथ खुलेगी । 
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लो मैंने बंद कर दिया कोढि़यों की तरह शब्द थूकते रहना 
सावधान।
मैं कुछ खतरनाक शब्दों की जंजीरें खोलने जा रहा हूं 
ये तुम्हें काटेंगे और जिंदा छोड़ देंगे ताउम्र भोंकने के लिए। 
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अब कोई आईना 
मेरे लिए परछाइयों का कब्रिस्तान नहीं है 
अब मैं परछाइयों को आकृतियों में 
और आकृतियों को परछाइयों में बदल सकता हूं ।
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‘लैजरस उठो।‘ मैं नहीं कहूँगा 
मैं नहीं करूँगा जीवितों का अपमान
मैं कहूँगा 'लैजरस आँखें खोलो'
मैं अब बारूद की गंध को ऑक्सीजन में बदल सकता हूं । 
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मुझे याद है 
मैं कई बार भाग खड़ा हुआ था कई मोर्चों से 
पर आज खड़ा होता हूँ 
अपने विरुद्ध एक नए समर में। 
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मैं तोड़ूँगा कुछ भी नहीं 
सिर्फ परिभाषाएं सुधार दूँगा
और कुएँ के पहाड़ बिखर जाएंगे। 
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तुम देखना 
बेकार नहीं जाएगी मेरी फुसफुसाहट 
नहीं धरती धँसेगी नहीं 
नहीं झुकेगा आसमान 
पर इसके स्पर्श से 
गर्व में तने कँगूरे हवा मुर्ग में बदल जाएंगे। 
लो मैं तुम्हें सौंपता हूं अपनी कविता 
तुम इससे कोई भी काम ले सकते हो 
नाबदान साफ करने से लेकर 
धमनभटि्ठयां चलाने तक 
पर तुम इसे बिछा कर सो नहीं सकते ।
बेशक, उस राजकुमारी को मुक्त करा सकते हो 
जो तहखाने में बंद है
जिस पर विषधर नाग पहर दे रहे हैं।

‘’तुम्हारी कविता तो सुन ली। कवियों की दुर्बलता है, वे निज कबित्त केहि लाग न नीका, सरस होय अथवा अति फीका वाले नियम से बँधे होते हैं। पर तुम तो अब कवि भी नहीं रह गए, बात तमिल की चल रही थी और इस बीच तुम कविया उठे। दोस्ती का लिहाज कर के चुपचाप सुन भी लिया, पर इसकी यहां कोई जरूरत थी।
मैं यह बताना चाहता था हमारे बौद्धिक वर्ग का बौद्धिक स्तर और सरोकार कैसे ललित साहित्य और अख़बारी सूचनाओं तक सीमित रह गया है उसमें न साहित्य की समझ है न समाज की समस्याओं की, न अपने देश की, न अपने भविष्य की, और न ही अपनी सीमा को पहचान। इसलिए आगे बढ़ने के रास्ते वही बंद करता है। एक प्रबुद्ध आलोचक, विजयमोहन सिंह ने इस संग्रह की आलोचना की थी और उन्होंने उसको समझने में कुछ ग़लतियां की थीं।इसका प्रभाव यह पड़ा कि उसके बाद मैंने कविता से मुँह फेर लिया परन्तु कविता ने मुझसे मुँह नहीं फेरा इसलिए चोरी चोरी जो रुक न सका उसे दर्ज कर लेता हॅू। मैं कवि होने का दावा नहीं करता परन्तु क्या वे जो कविता, कहानी, और उन्हीं की आलोचना तक सीमित हैं, वे अपने सीमित दायरे में भी चीजों को समझते हैं। क्या मेरे आलोचक को पता था उन प्रयोगों का अर्थ 
तिलिस्म – एक मायावी यथार्थ, जो है नहीं, पर जिसे सही बना दिया और मान लिया गया है अर्थात् गलत मान्‍यताएं जो सत्‍य की तरह पढ़ाई जा रही है।
नाखून की मैल से – अकेले दम पर, साधन हीनता के बावजूद जो कुछ सुलभ है उसी के माध्यम से सत्य की स्थापना जिसे बहुत से लोग एक नये तरह का भ्रम समझ सकते हैं।
कोढि़यों की तरह शब्द थूकते रहना – ऐसी अभिव्यक्ति जो निष्प्रभाव है और अपनी व्यर्थता के कारण गर्हित। 
लैजरस – लेजी व्यक्ति या समाज जो मरा तो नहीं है परन्तु किन्हीं मारक प्रभावों में अचेत है। 
इस प्रतीकात्मिकता की व्‍याख्या को बढ़ाया भी जा सकता है।‘’
‘’यार तुम फिर अपना राग अलापने लगे।‘’
’’राग नहीं अलाप रहा था। अपने राष्ट्रीय बौद्धिक गिरावट पर विलाप कर रहा हूँ जिसमें ललि‍त लवंग लता परिशीलन की परिधि में भी समझ ग़ायब है, उसमें वैचारिक स्तर पर किसी नए विचार का स्वागत हो सकता है?
''यह कविता मैंने 1969 से पहले लिखी थी। आर्यद्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता 1973 में प्रकाशित हुई थी । उसमें इन विचारों का भाष्य तो न हुआ था, पर यह स्थापना केन्द्रीय थी, यह तो पुस्तक के नाम से ही प्रकट है। गो नाम भ्रामक था, इसलिए बदलना पड़ा। उसमें यह भ्रम पैदा हो सकता था कि कोई एक आदि भाषा थी जिससे आर्य और द्रविड़ भाषाओं का जन्म हुआ और आगे का विभाजन हुआ जब कि उसमें एक से बहु नहीं, बहु के बीच एक के नियम से किसी एक भाषा का अपने निकट की भाषाओं में स्वीकार्य हो कर मानक दर मानक बनते चले जाने की प्रक्रिया है। हमारे मनस्वी लोग पुस्तक पढ़े बिना शीर्षक से ही उसकी अन्तर्वस्तु का अनुमान लगा कर उसकी छुट्टी कर देते हैं।’ 
उस पुस्तक से अधिक महत्व पूर्ण रचना मैंने आज तक नहीं की। जो कुछ आगे लिखा उसी का भाष्य था। भाष्य को जिन्होंने समझा वे भी मूल को न समझ पाए अन्यथा तुम्हें मेरा कथन शिगूफा नहीं लगता।
’तुम्हारी भड़ास तो सह ली, पर अब भी समझ में नहीं आया तुम हिन्दी और तमिल के बीच किस कशीदाकारी की बात कर रहे थे।'' 
''तुम यह बताओ, तुम ठंढ, तड़ाग, ताड़, ताल का मतलब जानते हो?''
''क्या मज़ाक करते हो। मेरी हिन्दी इतनी कमजोर तो नहीं जो इनका अर्थ तक न जानूँ।'' 
''नहीं जान सकते, तुम मतलब को नहीं, ठप्पे को जानते हो। टैग को जानते हो। मतलब वहॉं छिपा मिलेगा जहाँ तुम समझोगे कि इसे यह नाम क्यों मिला। इस संज्ञा का आधार क्या है। समझे? तुम तो ताल और तालाब के बीच भी फर्क नही कर सकते क्योंकि तुम सत्ता के उपयोग की भाषा को जननी और सत की भाषा को उससे जनित मानते हो।'
'' पहेलियाँ मत बुझाया कर यार, कहना क्या चाहता है?''
'' तुम कभी किसी दक्षिण भारतीय ढाबे में गए हो। किसी को पानी के लिए तन्नी का प्रयोग करते सुना है?''
''गया हूँ, सुना भी है, मतलब भी जानता था। बात बात पर इस तरह की अकड़ क्यों दिखाते हो।'' 
‘यह बताने के लिए कि तन्नी का अर्थ है पानी पानी अर्थात् ठंढा पानी। तण् – पानी, नीर – पानी। पानी पानी अर्थात् ठंडा पानी। अर्थात् पानी से ही ठंढ की संकल्पना भी जुड़ी है। अब उस तण् को संस्क़ृत अौर हिन्दी के तड़ाग में देख सकते हो। ताड़ी में देख सकते हो। ठंढ में पहचान सकते हो। तड़ तो तल में बदलते देख सकते हो। अब ताल का अर्थ है जलाशय यह समझ सकते हो। और तालाब को तुम तन्नी् के नियम से पानी पानी कह सकते हो, ताल –पानी, अप्/ आप –पानी, फारसी आब –पानी और तालाब। पर अब उल्टी यात्रा करो। तर- पानी, तरंग – पानी की लहर या उसका अंगभूत, तरणी, तरना आदि पर ध्या न दो। तर तल हो सकता है, र और ल में भेद नहीं है, रलयोरभेद:, ल ळ बन कर ड़ और फिर ण बन सकता है। इस गहन स्तर पर कौन तय करेगा कि तर तण् बना या इसके विपरीत हुआ, पर जो बात निश्चित है और जिसे समझाना बहुत मुश्किल है वह यह कि ये भाषाएँ आदिम स्तर से ही एक दूसरे से जुड़ी और एक दूसरे को प्रभावित करती रही है कि यह तय कर पाना तक कठिन होता है कि कौन सा शब्‍द मूलत- किसका है और इस रहस्य को समझे बिना हम उन शब्‍दों का भी अर्थ नहीं समझ सकते जिनका नित्य प्रयोग करते हैं।'' 

सुन लिया, पर यह बताओगे कि तुम हर चीज को बोरडम तक क्यों पहुँचा देते हो। सुनने वाले तुम जैसों के पाले पड़ने पर सोचते हैं, मैं बहरा क्यों न हुआ। मैं बहरे समाज से ही बात करता रहा हूँ।


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विपन्न वर्गों का हित मातृभाषा से जुड़ा है

नरेश मेहता को नमन करते हुए

“कहाँ ग़ायब हो गए थे भाई?”

“प्रयोग कर रहा था कि 3 दिन में आदमी कितना बूढ़ा हो सकता है।‘’ 
‘’पता चल गया?’’ 
‘’बात करोगे तो पता चलेगा अनुभव कितना अधिक हो गया है, कमर कितनी टेढ़ी हो गई है, याददाश्त कितनी कम हो गई है, थकान कितनी बढ़ गई है, निराशा कितनी गहरी हो गई है, और संकल्प कितना दृढ़ हो गया है।‘’
‘’हां कुछ तो है मैं भी देख रहा हूं - पहले से कम बेवकूफ़ लग रहे हो, चाल चलन भी गड़बड़ लग रहा है , डगमगाते हुए चल रहे थे, और मुझसे बात करते हुए तो बजरंगबली की गदा ताने हुए से लग रहे हो! लेकिन सिर्फ 3 दिनों में इतना कुछ कर डाला । कमाल है। यह हुआ कैसे?
’’अरे यार एक मित्र ने सुझाया करपात्री बन जाओ। मैंने हाथ आगे फैला दिया। उसने कहा, इधर नहीं, उधर, देखो उधर बेचारे मध्य प्रदेश के राष्ट्र भाषा प्रचार समिति वाले सम्मान संभाले खड़े है। इस समय जब सभी सम्मानित जन अपना सम्मान त्याग रहे हैं, अपमान का शोर मचाने पर सिंहासन हिल जा रहे है, सम्मान लेने को कोई तैयार नहीं। मौका मत चूको, हाथ बढ़ा दो। मैंने सोचा बढ़ाने की ही तो बात कर रहा है, घटाने की तो नहीं, बढ़ा दिया पंचतंत्र की भाषा में, 'भाग्येन एकदपि संभवम्।' मैं क्या जानता था कि सम्मान का बोझ इतना अधिक होता है कि रीढ़ तक जवाब दे जाय।" 
अक्ल से तो काम लिया होता, किसी ने सुझाया और तुम मान गए। थोड़ा नाटक वाटक तो करना था।‘’ 
"किया था यार, जब पहली बार चयन समिति के एक मित्र ने सूचित किया अब की बार तुम्हारी बारी तो मैंने कहा, मुझे कहाँ घसीट रहे हो, किसी दूसरे को पकड़ो। उसने कहा, अब तो जो होना था हो गया। और अगले ही दिन कलमबन्द कागज ।‘’
‘’मध्य प्रदेश में, भाजपा के राज में, भाजपा के इशारे पर ही सब कुछ होता है, साहित्य, कला, संस्कृति, इतिहास से जुड़े सभी निर्णय शाखा से शाखामृग के लगाव को ध्यान में रख कर ही किए जाते हैं। यह पता था तुम्हें? 
’’दोहरा फायदा था यार, बिना शाखा से जुड़े और बिना शाखाचर बने, दोनों का लाभ मिल रहा था। और क्या चाहिए था। उत्साह दूना हो गया।‘’
’’तुमने यह पता लगाया कि यह पुरस्कार भगवान सिंह को दिया जा रहा था या डॉ. श्री भगवान सिंह को?’’ 
"शायद दोनों को, जो पहले पहुंच जाता लेकर चला आता क्योंकि परिचय में डॉ. भगवान सिंह लिखा हुआ था जो मैं हूं नहीं और ‘श्री’ नहीं लिखा था जो कि वह है इसके खतरे थे, मौका हाथ से निकल जाता तो सिर पर हाथ मारने के सिवाए कोई चारा न रह जाता। फिर भी सावधानी बरती। कहा, मेरा टिकट आप बुक कराएँगे और तिथि भी आप ही तय करेंगे। टिकट ‍भी मेरे पते पर आ गया तो मानना ही था कि मैं वही भगवान सिंह हूँ जो मरीज़ है, डाक्टर नहीं और श्रीहीन तो है ही । लेकिन मेरे मित्र की पत्नी, मधु को अब भी यकीन न था । कहा, भाई साहब, आप दो दिन पहले ही चले जाइए। कहीं आपके हाथ से निकल ना जाए। आप जानते नहीं हैं वहां कितने घोटाले होते हैं। मैंने लाचारी प्रकट की, ‘टिकट 24 तारीख का है, चाहूँ तो भी रिज़र्वेशन इतनी जल्दी मिलेगा नहीं।‘’ 
उसने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा, ‘’किया भी क्या जा सकता है। चले जाइएगा, यदि बचा रहा तो मिल भी सकता है।‘’ 
'कमाल की बात यह कि वह सचमुच बचा रह गया था।' हालाँकि वहाँ आमंत्रित दर्जनाधिक विद्वान थे, भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, इतिहास, अभियान्त्रिकी, दर्शन आदि विषयों के पारंगत पर, वे इतना ही बता पाए कि उनके क्षेत्र में हिंदी में क्या काम हुआ है या हो रहा है और इस मामले में यह एक अच्छा आयोजन था, क्योंकि उनमें से किसी ने यह नहीं कहा कि इतना काम मैंने किया है, इसलिए दोबारा विचार करो और कम से कम आधा सम्मान मुझे भी दो। पहली बार लगा की हिन्दी में इतना अधिक काम हो रहा है की या तो हिंदी रहेगी या वे विषय। लेकिन साथ ही यह दुःख भी प्रकट किया जा रहा था कि इन विद्वानों की उपेक्षा हिन्दी में लिखने के कारण हो रही है। मुझे लगा वे जिस हिन्दी में लिखते हैं उसके कारण हिन्दी की उपेक्षा हुई है।"
"दुर्दशा हिन्दी की ही नहीं है, समस्त भारतीय भाषाओं की है क्योंकि हम बाहरी उपनिवेशवाद से मुक्त, होने के साथ आंतरिक उपनिवेशवाद के शिकार हो गए ! सत्ता का हस्तांतरण हुआ, उपनिवेशवाद का खात्मा नहीं ।"
"सोलह आने दुरुस्त! नए उपनिवेशवादियों के हित अंग्रेजी से जुड़े थे और अंग्रेजी को भारतीय भाषा सिद्ध करने के लिए नेहरू जी ने पूरा नगालैंड वेरियर एल्विन के हवाले कर दिया था। आश्चर्य नहीं कि अंग्रेजों के विदा होने के बाद इतनी जल्द इस देश के एक कोने में एक अंग्रेजी राज्य खड़ा कर लिया गया और संविधान में अवसर की समानता के आश्वासन के बाद भी शिक्षा में ही अवसर की समानता समाप्त कर दी गई। अल्पसंख्यक भाषा के सामने हिन्दी जैसी बड़ी भाषा की बात करना संकीर्णतावादी माना जाने लगा और अंग्रेजी को कायम रखने के लिए इसे विश्वभाषा कहा जाने लगा। यह भुला दिया गया कि दुनिया क्या अंग्रेजी पूरे यूरोप तक की भाषा नहीं है। यह अंग्रेज़ो और उनके औरस या अनौरस संतानों की ही भाषा है, वे चाहे कहीं भी बसे क्यों न हों।
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मैंने जो कुछ कहा वह ठीक से नहीं कह पाया फिर भी लोगों को अचरज में डालने वाला तो था ही। कहना चाहा हिन्दी क्षेत्र में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का क्या मतलब, लेकिन लगा, यह उस संस्थान और उस चयन समिति का ही अपमान होगा जिसने आपको सम्मान के योग्य समझा। इसलिए एक दो उदाहरण दे कर बताया कि आप संस्कृत सहित अपने देश की किसी भाषा को अच्‍छी तरह नहीं समझ सकते जब तक दक्षिण की किसी भाषा, वैदिक भाषा और अपनी मातृबोली को नहीं समझते। बताया कि हमारी बोलियों में ही कई बोलियों या भाषाओं के तत्व नहीं विद्यमान हैं अपितु बहुत से शब्द ऐसे हैं जिनका निर्माण कई बोलियों या भाषाओं के प्रभाव में हुआ है। इसका एक उदाहरण तेलुगू की एक की संख्या ओकटि है। इसमें संस्कृत का एक तमिल की प्रधान बोली के प्रभाव से ओक हो गया क्योंकि उसमें एक के लिए ओन्र का प्रयोग होता है। सो एकार ओकार में बदला और लालित्य के लिए उसमें उस बोली का अन्‍त्‍य प्रत्‍यय ‘टि’ लगा जिसके प्रभाव से बांग्ला में एक टि, दू टी जैसे प्रयोग चलते हैं, बांग्ला में यह एक टा भी हो सकता है और उसका प्रभाव भोजपुरी में किसी ओकार प्रिय बोली के प्रभाव से ठो हो गया, और एक ठो, दू ठो बोला जाता है। इस ठो का एक वैकल्पिक रूप गो भी है, इसलिए एक गो, दू गो भी चलता है। यह गो मराठी के आई गो या माई रे तक पहुँचा हुआ है। बताया कि जिन्हें आप संस्कृत का मूल शब्द समझते हैं, वह किसी बोली के मूल शब्द का तद्भव भी हो सकता है। उदाहरण 'सुख' का दिया जिसका प्राचीन अर्थ पानी था इसलिए चंडीगढ़ के पास जिस सुखना झील के बारे में एक सज्जन बता रहे थे, पहले यह सूख जाया करती थी इसलिए यह नाम पड़ा वह भ्रम तब टूटा जब देखा यह नाम छत्तीसगढ़ और असम में भी झीलों के साथ भी जुड़ा है। इस सुख का विलोम ही सूखा है, जहां वह नियम काम करता है जो तमिल में प्रभावी है, स्वर को दीर्घ करके विलोम बनाना । वेंडुम – चाहिए; वेंडाम - नही चाहिए। यह सूखा संस्कृत में शुष्क हो जाता है और शोषण आदि बन कर कम्युनिस्ट आंदोलन के काम आता है, परन्तु फारसी में यह खुश और खुश्क बन जाता है और अंग्रेजी में सक – चूसना, सुकुलेंट रसीला आदि अर्थ देता है। इसलिए तीन बातों पर ध्यान दें:
पहली यह कि हमारी बोलियाँ संस्कृत से अधिक पुरानी हैं, उनके तद्भव प्रतीत होने वाले शब्द‍ तत्सम और संस्कृत के तत्सम अपनी बोलियों के किसी शब्द का तद्भव हो सकते हैं; 
दूसरी यह कि भारत की भाषाई दुर्गति के लिए हिन्दी वाले जिम्मेदार हैं जिन्होंने इसे राष्ट्रभाषा बनाने के अभियान में तो कोई भूमिका नहीं निभाई, सारा काम बंगालियों और गुजरातियों और मराठियों और कुछ दूर तक तमिलों ने भी किया, परन्तु संविधान में इसे राष्ट्रभाषा का स्थान मिलने के साथ ही इस तरह का तेवर अपना लिया मानो हिन्दी‍ अंग्रेजी का स्था‍न ले रही है और भारत पर अंग्रेजी राज की जगह हिन्दी राज स्थापित होने वाला है। आज भी स्थिति बेकाबू नहीं है। कमी संकल्‍प की है। यदि और हिन्दी वाले और खास करके दलित इस बात के लिए कृतसंकल्प हो जाएं कि भारतीय भाषाएं अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त करें तो अंग्रेजी इसमें बाधक बनने की लाख कोशिशों के बाद भी बाधा नहीं डाल सकती परन्तु दलित समाज को झूठे झगड़ों में डाल कर अंग्रेजी प्रेस, ईसाई संगठन और छद्म विदेशी शक्तियां उनकी सबसे जरूरी मांग, मातृभाषा में शिक्षा और अवसर की समानता से भटकाने में समर्थ रही हैं जिसके साथ बीच बीच में मुस्लिम कट्टरतावादी भी जुड़ जाते हैं जिनके भी विपन्न वर्गों का हित मातृभाषा से जुड़ा है। इसकी ताजी मिसाल हैदराबाद से चला आन्दोलन है। 
तीसरी यह कि हिन्दी क्षेत्र में राष्ट्रभाषा प्रचार समितियों और संगठनों को दक्षिण भारतीय भाषाएं सिखाने का काम उसी तरह करना चाहिए जैसे दक्षिण भारतीय क्षेत्र में इनको हिन्दी सिखाने और इसका प्रचार करने में लगाना चाहिए। यदि हिन्दी प्रेमी विश्व हिन्दी सम्मेलन करने की जगह भारत पर सांस्कृतिक आक्रमण कर दें, जिस तरह दूसरी भाषाओं के दर्जनों ऐसे लोग मिलते हैं जो अधिकार से हिन्दी बोल और लिख लेते है, उसी तरह हिन्दी भाषियों में भारत की सभी भाषाओं पर अधिकार रखने वाले, उनमें लिखने और प्रवाह के साथ बोलने वाले दर्जनों विद्वान पैदा हो सकें तो वह सारा तनाव शिथिल हो जाएगा जिनके कारण सभी भारतीय भाषाओं का अहित हुआ है और शिक्षा की भाषा व्यावसायिक भाषा बन चुकी है जिस तक ग़रीबों की पहुँच नहीं और जिसके कारण यह आंतरिक उपनिवेशवाद पैदा हुआ है। लोकतन्त्र में बड़ी ताकत है। 
'कोई तुम्‍हारी सुनेगा भी। यह तो रस्म अदायगी हुई। भाषण अच्छा ही दिया तुमने।''
''मैंने इसे यथार्थ में बदलने की अपनी छोटी सी कोशिश में पचास हजार की वह रकम यह कह कर समिति को सौंप दी कि इसे तमिल सीखने वाले या उस पर पकड़ रखने वाले किसी हिन्दी भाषी विद्वान को दें और उन्होंने इस प्रस्ताव और धनराशि को सहर्ष स्वीकार कर लिया। इससे प्रेरणा तो मिलेगी ही।''
'' तुम भावुक मूर्ख हो। इसकी क्या जरूरत थी।''
''भावुक मूर्ख मैं नहीं, महिमा मेहता हैं। यह पुरस्कार नरेश मेहता की स्मृति में उन्होंने आरंभ की जिसे गोविंद चन्द्र पांडे और यशदेव शल्य जैसे लोग प्राप्त कर चुके हैं। नरेश जी ने बहुत आर्थिक तंगी झेली थी पर जीवन में कभी न माथा कहीं झुका न ठसक कम हुई और पुरस्‍कारों से मिली जो धनराशि थी उसे शायद अपने उपयोग तक में नहीं लिया और उससे यह निधि बनी है। इतनी पवित्र उपलब्धि का उपयोग उसी विनम्रता से किसी अन्य योजना के लिए होना जरूरी था। तमिल की शिक्षा का भारत के लिए उतना ही महत्‍व है जितना संस्‍कृत शिक्षा का।

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